चंद्रशेखर यूपी में मायावती का बिगाड़ेंगे सियासी गेम

चंद्रशेखर ने बनाई नई पार्टी, क्या मायावती का यूपी में बिगड़ेगा सियासी गेम?

रविवार को अपनी राजनीतिक पार्टी का ऐलान करने के बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने इसका नाम आजाद समाज पार्टी (एएसपी) रखा है। लेकिन इस पार्टी के ऐलान के साथ ही सियासी गलीयारों में इसे लेकर चर्चा का बाजार गर्म हो गया है कि क्या चंद्रशेखर की नजर दलित समुदाय और बसपा के वोटबैंक पर है। ये सवाल इसलिए भी क्योंकि चंद्रशेखर ने अपनी सियासी पार्टी की घोषणा के लिए बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती का चुनाव किया। इतना ही नहीं चंद्रशेखर के पार्टी के झंडे का रंग मायावती की पार्टी के झंडे का रंग जैसा नीला है। इसका सीधा संबंध जोड़ा जाए तो चंद्रशेखर दलित समुदाय और बसपा के वोटबैंक को साधने की फीराक में हैं।

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भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने रविवार को अपनी राजनीतिक पार्टी का ऐलान कर दिया है, जिसका नाम आजाद समाज पार्टी (एएसपी) रखा है. चंद्रशेखर ने अपनी सियासी पार्टी की घोषणा के लिए बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती को चुना. इसके अलावा चंद्रशेखर ने अपनी पार्टी के झंडे का रंग नीला रखा है जबकि मायावती की पार्टी के झंडे का रंग भी नीला ही है. इससे समझा जा सकता है कि चंद्रशेखर की नजर दलित समुदाय और बसपा के वोटबैंक पर है।

ऐसा माना जा रहा है कि चंद्रशेखर की इस पहल से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए रंग उड़ते दिखाई दे सकते हैं। मायने ये भी लगाए जा रहे हैं कि मायावती चंद्रशेखर के लिए गले की फांस बन सकते हैं। ध्यान हो कि बसपा प्रमुख कई बार ये आरोप लगा चुकी हैं कि सत्ताधारी दल के इशारे पर चंद्रशेखर काम कर रहे हैं। हालांकि, कुछ सालों में दलितों का उत्तर प्रदेश में बीएसपी से मोहभंग होता दिखा है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव मेंदलितों का एक बड़ा धड़ा अब मायावती के साथ की बजाय बीजेपी के साथ दिखा। लेकिन जिस तरह से दलित एक्ट में संशोधन हुआ, उससे ये वर्ग बीजेपी के साथ को लेकर पसोपेश में है। ऐसे में चंद्रशेखर ने अपनी नई सियासी पार्टी का ऐलान कर अपने राजनीतिक मंसूबे जाहिर कर दिए हैं।

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गौरतलब है कि पहली बार सहारनपुर में हुई एक जातीय हिंसा के बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर चर्चा में आए थे। ठाकुरों और दलितों के बीच हुए संघर्ष में दलित समाज के युवाओं में चंद्रशेखर एक लोकप्रिय नेता जैसे बनकर उभरे थे। इसके बाद कांग्रेस से उनकी नजदीकियां भी दिखी हैं। पिछले दिनों जब चंद्रशेखर अस्पताल में भर्ती हुए थे तो उनका हाल-चाल लेने प्रियंका मेरठ के अस्पताल पहुंची थीं। इसके बाद चंद्रशेखर को दिल्ली में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन करने के चलते दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। तब भी प्रियंका उनके समर्थन में खड़ी नजर आई थीं।

यहां आपको ये भी बता दें, “उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी करीब 21 फीसदी से 23 फीसदी है। दलितों का यह समाज दो भागों में बंटा है। पहला जाटव, जिनकी आबादी करीब 14 फीसदी है और जो मायावती की बिरादरी है। चंद्रशेखर भी जाटव हैं, ऐसे में अब चंद्रशेखर ने मायावती की चिंता को बढ़ा दिया है। वहीं, गैर-जाटव वोटों की आबादी करीब 8 फीसदी है. इनमें 50-60 जातियां और उप-जातियां हैं”। यहां याद रखने वाली ये बात है कि मायावती और चंद्रशेखर एक ही जाति और एक ही क्षेत्र से हैं। दोनों का संबंध जाटव समाज से हैं। ऐसे में अगर चंद्रशेखर की झोली में जाटव समाज के वोट बैंक खिसकता है तो इसका सीधा असर मायावती की बीएसपी को हो सकता है। अब प्रदेश के सियासी गणित में दलित वोटबैंक के बीच क्या सियासी बवंडर उठेगा ये देखना दिलचस्प होगा।

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