कहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया की नज़रंदाजी तो नहीं बना ‘ऑपरेशन लोटस’ की वजह…?

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कमलनाथ की मौजूदा स्थिति आज ये हो गई है कि वो या तो सरकार चला लें, या फिर अपनी सरकार बचा लें।

नई दिल्ली: आज मध्यप्रदेश में राजनीतिक दृष्टिकोण से जो भी हालात बने हैं, उसके पीछे कहीं न कही मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार भी जिम्मेदार है। 2018 से पहली बार मुख्यमंत्री के रुप में सूबे के सूखे पहाड़ों पर विचरण करने वाले कमलनाथ की मौजूदा स्थिति आज ये हो गई है कि वो या तो सरकार चला लें, या फिर अपनी सरकार बचा लें। आए दिन कमलनाथ के सिपाही भागते रहते हैं, जिसे वो बार-बार पकड़ने में ही व्यस्त रहते हैं।

दरअसल, मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास को देखें तो 230 विधानसभा सीट वाले इस राज्य की अपनी बानगी है। जिसे कोई भी पहली बार में नहीं समझ सकता। आजादी के बाद से लंबे अंतराल तक कांग्रेस का गढ़ रहा मध्यप्रदेश कमलनाथ सरकार से पहले 15 साल के वनवास पर था। अब, जब 15 साल के बाद वनवास खत्म भी हुआ तो मुश्किलों से पीछा नहीं छूटा।

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने यहां बीजेपी को टक्कर देते हुए 230 में से 114 सीटों पर जीत दर्ज कर गंठबंधन की सरकार बनाई थी।  जिसके बाद मुख्यमंत्री कौन बनेगा इस बात को लेकर पेंच फंसा हुआ था। कयास लगाए जा रहे थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया या फिर दिग्विजय सिंह के हाथों में मध्यप्रदेश की कमान दी जा सकती है, लेकिन पार्टी नेतृत्व को कुछ और ही पसंद था तो कांग्रेस ने कमलनाथ पर कृपा कर दी।

कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद मध्यप्रदेश की सियासत में एक नया अध्याय जुड़ता चला गया वो ये कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी करना। ज्योतिरादित्य सिंधिया की पहचान को कम नहीं आंका जा सकता। ज्योतिरादित्य उस सिंधिया परिवार से आते है जिसके पिता ने कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक को हराया है।

आज तक सिंधिया परिवार कभी भी कोई चुनाव नहीं हारा है। बेशक कमलनाथ इंदिरा गांधी के बेहद करीबी रहे हों लेकिन मौजूदा समय में जो कांग्रेस पार्टी की  स्थिति है उस लिहाज से ज्योतिरादित्य की नजरंदाजगी पार्टी के हित में नहीं लगती। कमलनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया ने कहा है कि  ‘कमलनाथ जी की सरकार को संकट तब होगा, जब सरकार हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया जी की उपेक्षा या अनादर करेगी।